Ravi Pradosh Vrat Katha.

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रवि प्रदोष व्रत:

रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को रवि प्रदोष व्रत कथा जाता है। इस दिन भगवान शिव जी की पूजा की जाती है। जिस प्रकार एक वर्ष में 24 एकादशी होती हैं, ठीक उसी प्रकार साल में 24 प्रदोष व्रत भी होते हैं। किसी भी माह की त्रयोदशी तिधि को प्रदोष व्रत किया जाता है। यह प्रदोष किसको समर्पित है ये उस वार से निश्चित किया जाता है जिस वार पर त्रियोदशी तिथि पड़ रही है। रवि प्रदोष व्रत को शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत अनुकूल व लाभदायक माना जाता है। जो भी मनुष्य रवि प्रदोष व्रत विधि – विधान से करता है उसपर भगवन भगवान् सूर्यदेव की विशेष कृपा होती है। मान्यता है कि प्रदोष व्रत में व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। प्रदोष व्रत कथा का पाठ करने से भगवान शंकर की विशेष कृपा प्राप्त होती है और भोलेनाथ की कृपा से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

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रवि प्रदोष व्रत कथा :

एक गांव में अति दीन ब्राह्मण निवास करता था। उसकी पत्नी प्रदोष व्रत किया करती थी। उसे एक ही पुत्र था। एक समय की बात है, वह पुत्र गंगा स्नान करने के लिए गया। दुर्भाग्यवश रास्ते में चोरों ने उसे घेर लिया और वे कहने लगे कि हम तुम्हें मारेंगे नहीं, तुम अपने पिता के गुप्त धन के बारे में हमें बतला दो। बालक दीनभाव से कहने लगा कि बंधुओं! हम अत्यंत दुःखी दीन हैं। हमारे पास धन कहां है? तब चोरों ने कहा कि तेरे इस पोटली में क्या बंधा है? बालक ने कहा कि मेरी मां ने मेरे लिए रोटियां दी हैं , यह सुनकर चोरों ने अपने साथियों से कहा कि साथियों! यह बहुत ही दीन-दुःखी बालक है अत: हम किसी और को लूटेंगे। इतना कहकर चोरों ने उस बालक को जाने दिया।

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बालक वहां से चलते हुए एक नगर में पहुंचा। नगर के पास एक बरगद का पेड़ था । वह बालक उसी बरगद के वृक्ष की छाया में सो गया। उसी समय उस नगर के सिपाही चोरों को खोजते हुए उस बरगद के वृक्ष के पास पहुंचे और बालक को चोर समझकर बंदी बना कर राजा के पास ले गए। राजा ने बालक को कारावास में बंद करने का आदेश दिया। ब्राह्मणी का लड़का जब घर नहीं लौटा, तब उसे अपने पुत्र की बड़ी चिंता हुई। अगले दिन प्रदोष व्रत था, ब्राह्मणी ने प्रदोष व्रत किया और भगवान शंकर से मन-ही-मन अपने पुत्र की कुशलता की प्रार्थना करने लगी। भगवान शंकर ने उस ब्राह्मणी की प्रार्थना स्वीकार कर ली। उसी रात शंकर भगवान ने उस राजा को स्वप्न में आदेश दिया कि वह बालक चोर नहीं है, अतः उसे प्रात: काल छोड़ दें अन्यथा उसका सारा राज्य-वैभव नष्ट हो जाएगा।

प्रात:काल राजा ने भगवान शिव की आज्ञानुसार उस बालक को कारागार से मुक्त कर दिया। बालक ने अपनी सारी कहानी राजा को सुनाई। सारा वृत्तांत सुनकर राजा ने अपने सिपाहियों को उस बालक के घर भेजा और उसके माता पिता को राजदरबार में बुलाया। उसके माता पिता बहुत ही भयभीत थे। राजा ने उन्हें भयभीत देखकर कहा कि आप भयभीत न हो। आपका बालक निर्दोष है। राजा ने ब्राह्मण को 5 गांव दान में दिए जिससे कि वे सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकें। भगवान शिव की कृपा से ब्राह्मण परिवार आनंद से रहने लगा। जो भी मनुष्य प्रदोष व्रत को करता है, वह सुखपूर्वक और निरोगी होकर अपना पूर्ण जीवन व्यतीत करता है।

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